संगीतकार शंकर जयकिशन के- “100 पीस ऑर्केस्ट्रा” की कहानी.

संगीतकार शंकर जयकिशन के-


“100 पीस ऑर्केस्ट्रा” की कहानी.
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संगीतकार द्वय शंकर जयकिशन पर लिखे गये कई लेखों में हमने उनके “100 पीस ऑर्केस्ट्रा” की चर्चा तो सुनी है पर उनके इस समूह में कौन कौन से साज़ इस्तेमाल होते थे? और कौन कौन से साज़िन्दे हुआ करते थे??… इसकी जानकारी न के बराबर मिलती है.कहा जाता है कि शंकर जयकिशन अपनी पहली फ़िल्म ‘बरसात’ से ही सौ साजिंदों की परिकल्पना को साथ लेकर आये थे. ये दोनों की ख़ुशनसीबी थी कि उनको इतना बडा ऑर्केस्ट्रा रखने की इजाज़त पहली ही फिल्म “बरसात” से राज कपूर साहब ने दी थी.शायद राज जी को अंतर्प्रेऱणा हुई थी कि यह दोनों कुछ नया करने जा रहे है.दोनों ने राज कपूर के विश्वास को पूरी तरह सार्थक कर दिखया .पहली ही फिल्म ‘बरसात’ ने संगीत की दुनिया में तहलका मचा दिया. पर इस पर किसी पत्रकार या लेखक ने शंकर जयकिशन के “100 पीस ऑर्केस्ट्रा” [सौ साजिंदों] के बारे में कोई खोज कोई रिसर्च नहीं की,सिवा “Indian space research organisation” (ISRO) अहमदाबाद में लाइब्रेरियन के रूप में कार्यरत डॉक्टर पद्मनाभ जोशी के.उन्होंने बहुत हद तक ये भगीरथ कार्य कर दिखाया.


वे बम्बई गये,वयोवृद्ध हो चुके साजिंदों से मिले.काफ़ी जद्दोजहद के बाद उन्होंने पता लगाया कि किस साज़िन्दे ने शंकर जयकिशन के साथ कौन सा साज़ किस गीत में बजाया था.सिर्फ़ इसी जानकारी से वे संतुष्ट नहीं हुए.उन्होंने शंकर जयकिशन के सहायक संगीतकार सेबेस्टियन डिसूज़ा को गोवा में जा पकड़ा.दो तीन दिन गोवा में रह कर उन्होंने सेबेस्टियन से लगातार बातचीत करके काफ़ी हद तक शंकर जयकिशन के “सौ साजिंदों” की जानकारी नोट की. बाद में वो जानकारी उन्होंने शंकर जयकिशन के फैन्स के साथ शेयर की.इसके लिये हम सभी संगीत-प्रेमी डॉक्टर जोशी के हृदय से आभारी हैं.इसी जानकारी के कुछ अंशो का सारांश आज मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ.
कौन थे वे 100 साज़िन्दे??…आईये,सबसे पहले उनमें से दो-चार के बारे में जाने जो बाद में ‘स्वतंत्र संगीतकार’ के रूप में उभऱे और जिहोने फिल्म संगीत के’ स्वर्ण-युग’ में मूल्यवान योगदान प्रदान किया.

💧इलेक्ट्रोनिक साज बजाते थे:
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◆कल्य़ाणजी वीरजी शाह जो बाद में अपने छोटे भाई आनंदजी के साथ मिलकर स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उभरे.
◆विपिन रेशमिया जिन का पुत्र हिमेश रेशमिया आज संगीतकार गायक अभिनेता है.
◆दत्ताराम जो बाद में एक स्वतंत्र सुरीले संगीतकार बने.
◆ प्यारेलाल शर्मा जिन्हों ने बाद में लक्ष्मीकांत के साथ मिलकर जोडी बनाई.
◆ व्ही.बलसारा-जिन्होंने कुछ फ़िल्मी और कई अमर ग़ैर-फिल्मी की रचना की.
शंकर जयकिशन ने इन सबका गुरु बनकर इनको मधुर और यादगार ‘संगीत-सर्जन’ की कला सिखाई जो बाद में स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उनके लिए बड़ी उपयोगी साबित हुई.

💧अब हो जाये इन साजिंदों के साज़ का परिचय:
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◆कल्याणजी और विपिन रेशमिया इलेक्ट्रोनिक की बोर्ड + क्ले वॉयलीन बजाते थे.

◆दत्ताराम लय-वाद्य बजाते थे और सहायक संगीतकार के रूप में काम करते थे.

◆केरसी लार्ड एकोर्डियन और पियानो बजाते थे.

◆बीजी यानी बरजोर लार्ड कोंगो बजाते थे.

◆डेविड,लक्ष्मीकांत, महेन्द्र भावसार और किशोर देसाई मेंडोलीन बजाते थे.

◆रईस खान और जयराम आचार्य सितार बजाते थे.

◆गुडी सिरवाई,एनॉक डेनियल्स और वी.बलसारा एकोर्डियन बजाते थे.

◆रामसिंह शर्मा (संगीतकार प्यारे लाल के पिता) और मनोहारी सिंह सेक्सोफोन और ट्रम्पेट बजाते थे.

◆पंडित पन्नालाल घोष,सुमंत राज और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया बांसुरी बजाते थे.
शंकर जयकिसन के “100 पीस ऑर्केस्ट्रा” याने सौ साज़िदों में यह प्रमुख साज़िन्दे थे.इसके अलावा 40 से ज्यादा वॉयलिन-वादक,9 से 10 लय-वाद्यकार:जिसमें तबला-वादक,ढोलक-ढोलकी-वादक,पाश्चात्य लय-वाद्य के उस्ताद,खंजड़ी मजीरे, ट्राएंगल,मटकी,खोल-नाल इत्यादि बजानेवाले,आधा दर्जन गिटारवादक और क़रीब उतने ही हार्मोनियम-वादक इन के पास थे.इन सबके नाम यहां दे पाना संभव नहीं है.
अब आपके मन में सवाल उठ सकता है कि किसी एक साज़ के इतने सारे वादकों की क्या जरूर थी ? इस सवाल का जवाब ये है कि हर एक साज़ बजाने के अलग अलग तऱीके होते हैं.जैसे एक ही राग को अलग अलग घराने के फ़नकार अपने अपने ढंग से प्रस्तुत करते हैं,कुछ इसी तरह हर एक साज़ बजाने का हर एक कलाकार का अलग स्टाइल या अंदाज़ होता है.कौन सा कलाकार की कब कौन से गीत में आवश्यकता पडेगी ये प्रमुख संगीतकार ही सोच पर निर्भर होता है.1950 के दशक के उत्तरार्ध में जम्मु कश्मीर से पंडित शिवकुमार शर्मा,संतूर जैसा अनोखा और दिलकश साज़ लेकर आये जिन्हें फिल्म संगीत की दुनिया के संगीतकारों ने हाथों हाथ लिया.
वरिष्ठ साज़िन्दे किशोर देसाई और बीजी लार्ड के अनुसार- ‘शंकर जयकिशन सौ प्रतिशत ‘कानसेन’ थे. रिहर्सल या रिकॉर्डिंग के समय पूरे वाद्य-वृन्द पर इन के कान लगे रहते थे.मिसाल के तौर पर चालीस वॉयलिन एक साथ बजते थे तब भी जयकिशन या शंकर ग़लत नोटेशन बजाने वाले वॉयलिन वादक पकड़ लेते थे और उसे कहते था, “भाई,जरा अपना नोटेशन (स्वरलिपि) चेक करो,आप के बजाने में कुछ फर्क़ लगता है”..ऐसे ‘कानसेन’ थे दोनों’.
यही नहीं कौन से साज़ का कहां किस तरह इस्तेमाल किया जाये,कौन से साज़ की कौन सी ध्वनि (साऊन्ड़) किस तरह गीत में संजोई जाये? इसकी भी समझ इन दोनों की कमाल की थी. दोनों अपने आप में बेमिसाल स्वर-नियोजक थे.

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